पीओके चुनावों पर पश्चिमी देशों की चुप्पी पर उठे सवाल, रिपोर्ट में दोहरे मापदंड का आरोप
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में हाल ही में हुए तथाकथित विधानसभा चुनावों को लेकर पश्चिमी देशों के रुख पर सवाल उठाए गए हैं। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनावों के दौरान धांधली, मतदाताओं को डराने-धमकाने और विपक्षी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी जैसे आरोप सामने आए, लेकिन इसके बावजूद पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सीमित रही।
रिपोर्ट के अनुसार, कई विपक्षी दलों ने पाकिस्तानी अधिकारियों पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया है। विपक्ष का कहना है कि चुनावी अनियमितताओं के आरोप कोई नई बात नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसा पैटर्न बन चुका है जिसके कारण कई मतदाताओं को लगता है कि मतदान से पहले ही परिणाम तय कर दिए जाते हैं।
पाकिस्तान को लेकर अलग क्यों है पश्चिमी देशों का रवैया?
इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने टाइम्स ऑफ इस्राइल में प्रकाशित अपने लेख में दावा किया कि दक्षिण एशिया के अन्य देशों में चुनावी अनियमितताओं पर पश्चिमी देश अक्सर खुलकर प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि पाकिस्तान के मामले में अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया जाता है।
रेस्टेली के अनुसार, शीत युद्ध के दौर से लेकर 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद आतंकवाद विरोधी अभियानों तक, पाकिस्तान की रणनीतिक भूमिका के कारण लोकतांत्रिक जवाबदेही के मुद्दे को कई बार पीछे रखा गया। उनका कहना है कि इससे पाकिस्तान को एक प्रकार की “रणनीतिक छूट” मिलती रही है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ता दबाव
रेस्टेली ने अपने लेख में दावा किया कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा है। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं, न्यायपालिका पर दबाव की चर्चाएं होती रही हैं और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। उनके अनुसार, विपक्षी दलों के लिए राजनीतिक गतिविधियां पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई हैं।
उनका मानना है कि ऐसे माहौल में पीओके में चुनावी विवाद कोई अलग घटना नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक परिस्थितियों का हिस्सा है।
चुनावी वैधता पर उठ रहे सवाल
रेस्टेली के मुताबिक, यदि पीओके में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते हैं, तो इससे इस्लामाबाद के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर अपने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के दावों को मजबूत करना कठिन हो सकता है। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर चुनावी अनियमितताओं के आरोप वैश्विक स्तर पर भी राजनीतिक प्रभाव डाल सकते हैं।
पश्चिमी देशों की चुप्पी पर चिंता
विशेषज्ञ का तर्क है कि सुरक्षा सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि चुनावी धांधली के आरोपों पर प्रतिक्रिया कमजोर रहती है, तो इससे यह संदेश जा सकता है कि लोकतांत्रिक मानदंड केवल वहीं लागू होते हैं जहां बड़े देशों के रणनीतिक हित जुड़े हों।
रेस्टेली के अनुसार, इस तरह की धारणा पश्चिमी देशों की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां पहले से ही उनके प्रति संदेह का माहौल मौजूद है।

