अगरतला। त्रिपुरा की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। मुख्यमंत्री माणिक साहा ने रविवार को स्पष्ट किया कि भाजपा, टिपरा मोथा और इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) आगामी ग्राम समिति चुनाव मिलकर लड़ेंगे। यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब टिपरा मोथा लंबे समय से केंद्र और राज्य सरकार पर 2024 के त्रिपक्षीय समझौते को जमीन पर उतारने का दबाव बना रही थी।
माणिक साहा ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और टिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा के साथ हुई बैठक के बाद यह घोषणा की। करीब डेढ़ घंटे चली बैठक में चुनावी तालमेल के साथ-साथ त्रिपक्षीय समझौते को लागू करने पर भी चर्चा हुई।
साहा के मुताबिक बातचीत सकारात्मक रही और तीनों दलों ने ग्राम समिति चुनाव में मिलकर उतरने पर सहमति जताई है। सीटों के बंटवारे पर अभी अंतिम फैसला होना बाकी है। इसके लिए तीनों दलों के बीच बातचीत आगे बढ़ाई जा रही है।
2024 का समझौता बना गठबंधन की असली कुंजी
दरअसल, भाजपा और टिपरा मोथा के बीच सबसे बड़ा मतभेद आदिवासी अधिकारों और 2024 के त्रिपक्षीय समझौते के क्रियान्वयन को लेकर रहा है। इस समझौते में आदिवासी समुदायों के भूमि और राजनीतिक अधिकारों के साथ उनकी पहचान, भाषा, संस्कृति और आर्थिक विकास से जुड़े मुद्दों को संबोधित करने का प्रावधान है।
टिपरा मोथा लगातार यह मांग उठाती रही है कि समझौते को केवल राजनीतिक घोषणा बनाकर न छोड़ा जाए, बल्कि उसके प्रावधानों को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए। अब केंद्र की ओर से इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की बात सामने आई है।
587 ग्राम समितियों में होगा मुकाबला
त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्रों में होने वाले ग्राम समिति चुनाव 28 सितंबर को प्रस्तावित हैं। कुल 587 ग्राम समितियों में 4,597 सीटों के लिए मतदान होगा। करीब एक दशक बाद इन चुनावों का आयोजन हो रहा है, इसलिए इनका राजनीतिक महत्व सामान्य स्थानीय चुनावों से कहीं ज्यादा माना जा रहा है। मतगणना 5 अक्टूबर को होगी।
भाजपा और टिपरा मोथा पहले इन चुनावों में अलग-अलग ताकत के रूप में मैदान में उतरते रहे हैं। ऐसे में इस बार दोनों का एक मंच पर आना त्रिपुरा की आदिवासी राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव है।
2026 के नतीजों ने दिखा दी थी टिपरा मोथा की ताकत
इस गठबंधन को समझने के लिए हालिया राजनीतिक गणित भी अहम है। 2026 के टीटीएएडीसी चुनाव में टिपरा मोथा ने अकेले चुनाव लड़ते हुए 28 में से 24 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को चार सीटें मिली थीं। ऐसे में भाजपा के लिए टिपरा मोथा केवल सहयोगी दल नहीं, बल्कि जनजातीय इलाकों में एक मजबूत राजनीतिक ताकत है।
यही वजह है कि ग्राम समिति चुनाव से पहले दोनों पक्षों के बीच सीटों और मुद्दों को लेकर बातचीत निर्णायक हो गई थी।
अब असली परीक्षा समझौते को लागू करने की
मुख्यमंत्री साहा ने संकेत दिया है कि समझौते के लंबित मुद्दों पर अगले महीने से आगे बढ़ने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। भूमि अधिकारों से जुड़े कदम भी चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की बात कही गई है।
लेकिन यहां भाजपा और टिपरा मोथा दोनों के सामने चुनौती है। चुनावी गठबंधन तो बन गया है, लेकिन आदिवासी अधिकारों से जुड़े वादों को जमीन पर लागू करना कहीं ज्यादा कठिन राजनीतिक परीक्षा होगी।
हमारी निगाह से
त्रिपुरा में यह सिर्फ एक चुनावी गठबंधन नहीं है। भाजपा को जनजातीय इलाकों में टिपरा मोथा की ताकत का साथ मिल रहा है, जबकि टिपरा मोथा को अपने सबसे बड़े राजनीतिक मुद्दे—आदिवासी अधिकारों पर केंद्र से आगे बढ़ने का आश्वासन मिला है। अब 28 सितंबर के चुनाव से ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि चुनावी साझेदारी के बाद 2024 का समझौता वास्तव में कितनी तेजी से जमीन पर उतरता है।






