नई दिल्ली/चंडीगढ़। पंजाब में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस ने अपने संगठन में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी ने सचिन पायलट को पंजाब का नया AICC महासचिव प्रभारी बनाया है और अब तक यह जिम्मेदारी संभाल रहे भूपेश बघेल को असम भेज दिया है। फैसला ऐसे समय हुआ है जब पंजाब कांग्रेस लंबे समय से अंदरूनी खींचतान से जूझ रही है।
लेकिन इस बदलाव की असली कहानी सिर्फ बघेल की जगह पायलट की नियुक्ति नहीं है। कांग्रेस के सामने पंजाब में सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से मुकाबला करने से पहले अपने ही नेताओं को एक मंच पर लाने की है।
कांग्रेस ने पंजाब में जिस समय पायलट को जिम्मेदारी दी है, वह राजनीतिक रूप से बेहद अहम है। विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं और पार्टी के सामने आम आदमी पार्टी की सरकार के साथ-साथ भाजपा और शिरोमणि अकाली दल से भी मुकाबला है। ऐसे में संगठन के भीतर चल रही खींचतान कांग्रेस की चुनावी तैयारी पर सीधा असर डाल रही थी।
पायलट की नियुक्ति को इसी संकट से निपटने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी के भीतर उनकी छवि ऐसे नेता की है जो संगठन के साथ मैदान में उतरकर काम करने पर जोर देते हैं।
असली विवाद राजा वड़िंग को लेकर है
पंजाब कांग्रेस का संकट एक पद को लेकर सबसे ज्यादा दिखाई दिया—प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग।
1 जुलाई को हाईकमान ने वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बनाए रखने का फैसला किया था। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद चन्नी समर्थक खेमे की ओर से वड़िंग को हटाने की मांग जारी रही।
मामला सिर्फ बंद कमरों तक नहीं रहा। पार्टी कार्यक्रमों में दोनों खेमों के समर्थकों के बीच नारेबाजी और टकराव की खबरें सामने आईं। यहां तक कि भूपेश बघेल के खिलाफ भी पंजाब में पोस्टर लगाए गए।
बघेल क्यों नहीं रोक पाए टकराव?
भूपेश बघेल को फरवरी 2025 में पंजाब का प्रभारी बनाया गया था। उनका काम राज्य के नेताओं को साथ लाना और संगठन को चुनाव के लिए मजबूत करना था।
लेकिन समय के साथ विवाद कम होने के बजाय बढ़ता गया। बघेल ने हाईकमान द्वारा वड़िंग को बनाए रखने के फैसले का समर्थन किया। इससे चन्नी खेमे की नाराजगी और बढ़ी और बघेल खुद भी विवाद के केंद्र में आ गए।
अब हाईकमान ने उन्हें पंजाब से हटाकर असम का प्रभारी बना दिया है।
पायलट के सामने सिर्फ संगठन नहीं, चुनाव भी
सचिन पायलट के सामने अब सबसे मुश्किल काम यह होगा कि वह चन्नी और वड़िंग के बीच चल रही खींचतान को चुनावी मशीनरी में बदल पाते हैं या नहीं।
उन्हें प्रदेश अध्यक्ष को साथ लेकर चलना होगा, चन्नी समर्थक नेताओं को भरोसे में लेना होगा और विधानसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण जैसी संवेदनशील प्रक्रिया को भी संभालना होगा।
इसके अलावा राहुल गांधी के पंजाब दौरे की तैयारियां भी चल रही हैं। प्रस्तावित दौरा 15 सितंबर के बाद होने की संभावना है और इसमें बस यात्रा का कार्यक्रम भी शामिल है। ऐसे में पायलट के लिए यह पहला बड़ा राजनीतिक टेस्ट बन सकता है।
पायलट की अपनी राजनीतिक परीक्षा भी
पंजाब की जिम्मेदारी सचिन पायलट के लिए सिर्फ संगठनात्मक नियुक्ति नहीं है। यह उनके राष्ट्रीय राजनीतिक कद की भी परीक्षा है।
पायलट राजस्थान की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे हैं और 2018 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही थी। बाद में राजस्थान में नेतृत्व को लेकर उनका टकराव भी हुआ और 2020 में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत की थी।
अब कांग्रेस ने उन्हें एक ऐसे राज्य की जिम्मेदारी दी है जहां पार्टी को पहले अपना घर व्यवस्थित करना है और फिर सत्ता के लिए लड़ना है।
हमारी निगाह से
पंजाब में कांग्रेस का यह फैसला असल में एक प्रभारी बदलने से ज्यादा, चुनाव से पहले पार्टी की रणनीति बदलने का संकेत है।
पायलट को इसलिए चुना गया है क्योंकि कांग्रेस को फिलहाल ऐसे चेहरे की जरूरत है जो अलग-अलग गुटों के बीच संवाद बना सके। लेकिन नियुक्ति के बाद असली चुनौती शुरू होगी। अगर पायलट चन्नी-वड़िंग विवाद को शांत कर पाए और नेताओं को चुनावी मुद्दों पर एकजुट कर पाए, तो कांग्रेस की पंजाब में वापसी की जमीन बन सकती है। अगर गुटबाजी जारी रही, तो नया प्रभारी भी उसी पुराने संकट में फंस सकता है।







